कंपनी का शासन 1773 से 1858 तक
भारत का संविधान एक की उपज न होकर वर्षों के अनुभव का प्रकाश पुंज है इसके जड़े स्वतंत्रता के वट वृक्ष की जड़ों से जकड़ी हुई हैं इसका इतिहास ईस्ट इंडिया
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| कंपनी का शासन 1773 से 1858 तक |
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(Historical Background)भारत का संविधान एक की उपज ना होकर वर्षों के अनुभव का प्रकाश पुंज है इसके जड़े स्वतंत्रता के वट वृक्ष की जड़ों से जकड़ी हुई हैं इसका इतिहास ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थापना के साथ प्रारंभ होकर इतिश्री सन 1950 में होता है।
1600 A.D का चार्टर
महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की और उसे पूर्वी देशों में 15 वर्षों तक व्यापार करने का अधिकार दिया। कंपनी के शिखर पर गवर्नर और 24 अन्य सदस्य थे इसे गवर्नर और उसके परिषद की संज्ञा दी गई।1726 का राजलेख
इस राजलेख के द्वारा कोलकाता मुंबई तथा मद्रास प्रेसीडेंसीयो के राज्यपालों तथा उनकी परिषद के विधि बनाने की शक्ति प्रदान की गई।कंपनी का शासन 1773 से 1858 तक
- भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित करने की दिशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाया गया यह पहला कदम था।
- इसके द्वारा पहली बार कंपनी के प्रशासनिक और राजनीतिक कार्यों को मान्यता मिली।
- इस अधिनियम के तहत बंगाल के गवर्नर को तीनों प्रेसिडेन्सियो का गवर्नर जनरल बना दिया गया।
- इस अधिनियम ने कंपनी के लिए लिखित संविधान प्रस्तुत किया और सुनिश्चित शासन पद्धति का श्रीगणेश किया
- इस अधिनियम के अधीन 1774 में कोलकाता में 4 सदस्यी सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई जिसमें मुख्य न्यायाधीश एलिजा एम्पे को बनाया गया।
- इस अधिनियम के तहत बंगाल का पहला गवर्नर जनरल लार्ड वारेन हेस्टिंग था इस अधिनियम द्वारा कंपनी के कर्मचारियों को बिना लाइसेंस प्राप्त किए व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया गया।
- इसके तहत कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार करने और भारतीय लोगों से उपहार व रिश्वत लेना प्रतिबंधित कर दिया गया।
- इसके द्वारा मद्रास एवं मुंबई के गवर्नर, बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन हो गए जबकि पहले सभी प्रेसीडेंसी के गवर्नर एक दूसरे से अलग थे।
- 1773 में लार्ड नार्थ द्वारा गठित एक गुप्त समिति की सिफारिश पर यह एक्ट पारित किया गया।
- बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की कार्यविधि को बढ़ा दिया गया जो 1 वर्ष के स्थान पर 4 वर्ष कर दिया गया।
- शासन सैनिक तथा सिविल शक्तियों को गवर्नर जनरल एवं उसकी परिषद जो 4 सदस्यी को सौंप दिया गया और निर्णय में बहुमत हेतु गवर्नर जनरल को निर्णायक मत देने का अधिकार प्रदान किया गया।
1781 एक्ट (Act of Settlement)
यह रेगुलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने के लिए आया इसे संशोधात्मक एक्ट की संज्ञा दी गई।इस अधिनियम के द्वारा कोलकाता की सरकार को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के लिए विधि बनाने का प्राधिकार दिया गया इस प्रकार कोलकाता की सरकार को विधि बनाने के 2 स्रोत प्राप्त हुए -
- रेगुलेटिंग एक्ट
- 1781 का एक्ट
1784 पिट्स इंडिया एक्ट
यह नियम कंपनी द्वारा अधिग्रहित भारतीय राज्य क्षेत्रों पर ब्रिटिश राज के स्वामित्व के दायित्व का पहला वैधानिक दस्तावेज है।कंपनी के व्यापारिक और राजनैतिक क्रियाकलापों को अलग-अलग कर दिया गया व्यापारिक क्रियाकलापों को कंपनी के निदेशकों के हाथ में यथावत रखते हुए राजनीतिक नियंत्रण दे दिया गया इसने निदेशक मंडल को कंपनी की व्यापारिक मामलों के अधीक्षण की अनुमति तो दे दी लेकिन राजनैतिक मामलों के प्रबंधन के लिए नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड आफ कंट्रोल )नाम से एक निकाय का गठन कर दिया। इस प्रकार द्वैध शासन की व्यवस्था का शुभारंभ हुआ।
राजनैतिक क्रियाकलापों के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण हेतु इंग्लैंड में 6 सदस्य नियंत्रक मंडल की स्थापना की गई इन सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार सम्राट को सौंपा गया गवर्नर जनरल परिषद की संख्या 4 से कम कर के तीन कर दी गई तथा इस परिषद को भारत में प्रशासन की शक्ति प्रदान की गई भारत में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों में अवैध कार्यों के लिए मुकदमा चलाने के लिए इंग्लैंड में कोर्ट की स्थापना की गई। कंपनियों के कर्मचारियों को उपहार पर प्रतिबंध लगा दिया गया इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को देशी राजाओं से युद्ध संधि करने से पूर्व बोर्ड आफ डायरेक्टरेट से स्वीकृति लेना पड़ता था।
इस प्रकार यह अधिनियम दो कारणों से महत्वपूर्ण था -
इस प्रकार यह अधिनियम दो कारणों से महत्वपूर्ण था -
पहला भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्र को पहली बार ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र कहा गया तथा दूसरा ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के कार्यों और इसके प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया।
1786 का अधिनियम
इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थिति में अपने परिषद के निर्णय को निरस्त करने एवं अपने निर्णय को लागू करने का अधिकार प्रदान किया गया। गवर्नर जनरल को प्रधान शक्तिया भी प्रदान की गई।1793 चार्टर एक्ट
इस एक्ट के द्वारा नियंत्रक मंडल को भारतीय राज्य से वेतन देने की व्यवस्था की गई ब्रिटिश भारतीय क्षेत्रों में लिखित विधियों द्वारा प्रशासन की नींव रखी गई सभी कानूनी व विनियमो की व्यवस्था का अधिकार न्यायालय को दिया गया।1813 का चार्टर एक्ट
इस एक्ट के तहत ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म प्रचार की अनुज्ञा दी गई एवं कंपनी का एकाधिकार टूट गया शिक्षा के लिए प्रति वर्ष एक लाख रुपये खर्च करने का उपबंध किया गया स्थानीय स्वायत्तशासी संस्थाओं को करारोपण का अधिकार दिया गया ध्यातव्य है कि इस राज लेख द्वारा कलकत्ता मुंबई और मद्रास सरकारों द्वारा निर्मित विधियों का ब्रिटिश संसद द्वारा अनुमोदन अनिवार्य कर दिया गया और ब्रिटिश सम्राट की स्वीकृति से कंपनी को गवर्नर जनरल तथा प्रधान सेनापतियों के नियुक्तियों का अधिकार दिया गया।1833 का चार्टर एक्ट
- बंगाल के गवर्नर जनरल को संपूर्ण भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया एवं पूरे भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार दे दिया गया। विधिक परामर्श हेतु गवर्नर जनरल के परिषद में चौथे सदस्य को जोड़ दिया गया। कंपनी के व्यापारिक एवं दायित्व को सौंपा गया विधियों की सहिंता कारण के लिए गवर्नर जनरल को आयोग गठित करने का अधिकार दे दिया गया।
- 1834 में लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में चार सदस्यी विधि आयोग का गठन किया गया इस अधिनियम की धारा 87 के तहत कंपनी के आधीन पद धारण करने के लिए धर्म मूल स्थान या रंग के आधार पर अयोग्य न ठहराए जाने का उपबंध किया गया ।
- गवर्नर जनरल की परिषद को शासन के संबंध में मूल अधिकार प्रदान करते हुए गवर्नर जनरल को संपूर्ण देश के लिए एक ही बजट तैयार करने का अधिकार दिया गया।
- भारत में संविधान निर्माण का आंशिक संकेत इसी चार्टर में दिया गया।
- इस एक्ट के तहत सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता का आयोजन शुरू करने का प्रयास किया गया।
- इसमें कहा गया कि कंपनी में भारतीयों को किसी पद कार्यालय और रोजगार को हासिल करने से वंचित नहीं किया जाएगा हालांकि कोर्ट आफ डायरेक्टर्स के विरोध के कारण इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया।
1853 का चार्टर एक्ट
- 1793 से 1853 के दौरान ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किए गए चार्टर अधिनियम की संख्या में यह अंतिम अधिनियम था।
- संवैधानिक विकास की दृष्टि से यह अधिनियम एक महत्वपूर्ण अधिनियम था इस अधिनियम के द्वारा विधायिका और कार्यपालिका को अलग कर दिया गया।
- भारत के लिए विधि निर्माण हेतु एक अलग 12 सदस्यी विधान परिषद की स्थापना की गई विभिन्न क्षेत्रों व प्रांतों के प्रतिनिधियों को इसका सदस्य बनाकर सर्वप्रथम क्षेत्रीय प्रतिनिधि सिद्धांत को लागू किया गया।
- बंगाल के प्रशासनिक कार्यों के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्त किया गया। विधि सदस्य गवर्नर जनरल की परिषद का पूर्ण सदस्य बना दिया गया कंपनी के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए नाम जिंदगी के स्थान पर प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था की गई निदेशक मंडल के सदस्यों को 24 से 18 वर्ष की आयु कर दी गई।
- इस ने प्रथम बार भारतीय केंद्रीय विधान परिषद में स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रारंभ किया गवर्नर जनरल की परिषद में 6 नए सदस्यों में से चार का चुनाव बंगाल, मद्रास, मुंबई और आगरा की स्थानीय प्रांतीय सरकारों द्वारा किया जाना था।

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